✍️ परिचय | Introduction
भारतीय राजनीति के इतिहास में 14 फरवरी 1975 का आपातकाल (Emergency) एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय है। इस दौर में कई नेताओं ने सरकार के निर्णयों का समर्थन किया, जबकि कुछ नेताओं ने खुलकर इसका विरोध किया। उन्हीं प्रमुख नेताओं में से एक थे मोहन धारिया (Mohan Dharia)।
वे कांग्रेस पार्टी में रहते हुए भी आपातकाल का विरोध करने के लिए जाने जाते हैं। उनका जीवन लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धांतों और सामाजिक सेवा का प्रतीक है।
👤 प्रारंभिक जीवन | Early Life
मोहन धारिया का जन्म 1925 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में हुआ था। बचपन से ही वे देशभक्ति और सामाजिक कार्यों की ओर आकर्षित थे।
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और युवावस्था में ही राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गए। उनकी सोच गांधीवादी सिद्धांतों से प्रभावित थी।
🏛️ कांग्रेस से जुड़ाव | Association with Congress
मोहन धारिया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक सशक्त वक्ता और दूरदर्शी नेता माने जाते थे।
1971 में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार में राज्य मंत्री बने। उनकी प्रशासनिक क्षमता और स्पष्ट विचारधारा के कारण वे तेजी से लोकप्रिय हुए।
🚨 आपातकाल का विरोध | Opposition to Emergency
25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया। इस दौरान नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए और राजनीतिक गतिविधियों को सीमित कर दिया गया।
मोहन धारिया ने इस निर्णय का खुलकर विरोध किया। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपनी मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
यह कदम उस समय साहसिक माना गया, क्योंकि अधिकांश नेता सरकार के निर्णय के साथ थे।
🗳️ जनता पार्टी में भूमिका | Role in Janata Party
आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में आम चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी।
मोहन धारिया जनता पार्टी सरकार में शामिल हुए और महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने 1977–1979 के बीच वाणिज्य और नागरिक आपूर्ति जैसे विभागों में कार्य किया।
🌱 सामाजिक एवं पर्यावरणीय कार्य | Social and Environmental Work
राजनीति से अलग होने के बाद मोहन धारिया ने सामाजिक और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य किया।
1986 में उन्होंने “वनराई” (Vanarai) नामक संगठन की स्थापना की। इसका उद्देश्य था:
उनका मानना था कि सतत विकास (Sustainable Development) ही देश की प्रगति का आधार है।
🏆 उपलब्धियाँ और सम्मान | Achievements and Recognition
मोहन धारिया को उनके राजनीतिक साहस और सामाजिक कार्यों के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए।
उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिसने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे लोकतंत्र के सच्चे समर्थक थे।
📚 छात्रों के लिए महत्वपूर्ण तथ्य | Important Facts for Students
यह विषय UPSC, SSC, राज्य सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
भारतीय लोकतंत्र में योगदान | Contribution to Indian Democracy
मोहन धारिया ने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र में असहमति (Dissent) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सहमति।
उनका आपातकाल का विरोध लोकतांत्रिक इतिहास में एक साहसिक कदम माना जाता है।
वे उन नेताओं में से थे जिन्होंने व्यक्तिगत लाभ से अधिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी।
🏁 निष्कर्ष | Conclusion
मोहन धारिया भारतीय राजनीति के एक सिद्धांतवादी और साहसी नेता थे। कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने आपातकाल का विरोध किया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो कठिन समय में भी सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा हो।
वे केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधारक और पर्यावरण प्रेमी भी थे।

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