चंपारण सत्याग्रह 1917 - किसानों के समर्थन में गांधीजी के सहयोगी
Champaran Satyagraha 1917 - Leaders Who Supported Gandhiji for Farmers’ Rights
नील की खेती के खिलाफ पहला सफल सत्याग्रह और गांधीजी के प्रमुख सहयोगी
India’s First Successful Satyagraha and Gandhiji’s Key Supporters
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में चंपारण सत्याग्रह (1917) का विशेष स्थान है। यह आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया पहला सफल सत्याग्रह था। बिहार के चंपारण जिले में अंग्रेज नीलहों (Indigo Planters) द्वारा किसानों पर जबरन तीनकठिया प्रथा थोप दी गई थी, जिसके तहत किसानों को अपनी भूमि के एक हिस्से पर नील की खेती करनी पड़ती थी। इससे किसान आर्थिक रूप से शोषित हो रहे थे।
1917 में किसानों की दुर्दशा से व्यथित होकर राजकुमार शुक्ल नामक किसान नेता महात्मा गांधी को चंपारण ले आए। यहीं से चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत हुई। इस आंदोलन में गांधीजी को कई प्रमुख नेताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण समर्थन मिला, जिनकी भूमिका आंदोलन की सफलता में निर्णायक रही।
महात्मा गांधी के प्रमुख सहयोगी
इन सभी सहयोगियों ने मिलकर किसानों को संगठित किया, उनके बयान दर्ज किए और ब्रिटिश सरकार के सामने किसानों की वास्तविक स्थिति उजागर की। गांधीजी ने अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलते हुए प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना की, जिसके कारण सरकार को जांच समिति गठित करनी पड़ी। गांधीजी इस समिति के सदस्य बनाए गए।
चंपारण सत्याग्रह का परिणाम
इस सत्याग्रह के परिणामस्वरूप तीनकठिया प्रथा को समाप्त कर दिया गया और किसानों को राहत मिली। यह आंदोलन न केवल किसानों की जीत था, बल्कि इससे गांधीजी राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनआंदोलनों की नींव बना।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि चंपारण सत्याग्रह केवल गांधीजी का आंदोलन नहीं था, बल्कि राजकुमार शुक्ल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा और अन्य सहयोगियों के सामूहिक प्रयास का परिणाम था। इन नेताओं के समर्थन ने किसानों को न्याय दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

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