सिकंदर महान (Alexander the Great) की मृत्यु के बाद उसका विशाल साम्राज्य कई भागों में बँट गया। उसके सेनापतियों (Diadochi) ने अलग-अलग क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में भी सिकंदर के सेनापतियों का शासन स्थापित हुआ। इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में चन्द्रगुप्त मौर्य का उदय हुआ, जिन्होंने न केवल भारत में एक सशक्त साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्युकस निकेटर (Seleucus I Nicator) को पराजित कर भारतीय इतिहास में एक निर्णायक अध्याय जोड़ा।
1. सिकंदर की मृत्यु और साम्राज्य का विभाजन
2. सेल्युकस निकेटर कौन था?
सेल्युकस निकेटर सिकंदर का प्रमुख सेनापति था। सिकंदर की मृत्यु के बाद उसने:
- सीरिया
- मेसोपोटामिया
- ईरान
- और भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (पंजाब, सिंध के आसपास)
पर अधिकार कर लिया। उसका साम्राज्य सेल्युकिड साम्राज्य कहलाया। भारत की सीमाओं तक उसका प्रभाव बना रहा, जो आगे चलकर चन्द्रगुप्त मौर्य से टकराव का कारण बना।
3. चन्द्रगुप्त मौर्य का उदय
भारत में इसी समय चन्द्रगुप्त मौर्य का उदय हुआ। उन्होंने:
- नंद वंश का पतन किया
- मगध में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की
- आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में एक संगठित और शक्तिशाली सेना तैयार की
चन्द्रगुप्त का लक्ष्य भारत को विदेशी शासन से मुक्त करना था, जिसमें सिकंदर के उत्तराधिकारी भी शामिल थे।
4. चन्द्रगुप्त और सेल्युकस के बीच संघर्ष
- चन्द्रगुप्त मौर्य की विशाल और संगठित सेना ने
- सेल्युकस की यूनानी सेना को पराजित कर दिया
यह पराजय सेल्युकस के लिए अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुई।
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5. सेल्युकस की पराजय और संधि
युद्ध में पराजित होने के बाद सेल्युकस को चन्द्रगुप्त मौर्य से संधि करनी पड़ी। इस संधि की प्रमुख शर्तें थीं:
- सेल्युकस ने भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (अफगानिस्तान, बलूचिस्तान के कुछ भाग) चन्द्रगुप्त को सौंप दिए
- चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस को 500 युद्ध हाथी दिए
- दोनों राज्यों के बीच मैत्री संबंध स्थापित हुए
- वैवाहिक संबंध की भी संभावना मानी जाती है
6. ऐतिहासिक महत्व
यह घटना भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह भारत में यूनानी राजनीतिक प्रभाव के अंत का प्रतीक बनी
- मौर्य साम्राज्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली बनकर उभरा
- चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रतिष्ठा एक महान विजेता शासक के रूप में स्थापित हुई
सेल्युकस की इस पराजय ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय शक्ति अब विदेशी साम्राज्यों से टक्कर लेने में सक्षम हो चुकी थी।

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