The Beginning of the Rupee: Sher Shah Suri and the Revolution of the Indian Currency System

 रुपये की शुरुआत: शेरशाह सूरी और भारतीय मुद्रा व्यवस्था की क्रांति

The Beginning of the Rupee: Sher Shah Suri and the Revolution of the Indian Currency System

The Beginning of the Rupee Sher Shah Suri and the Revolution of the Indian Currency System


16वीं शताब्दी भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल था। यह वह समय था जब राजनीतिक अस्थिरता के बीच कुछ ऐसे शासक भी हुए, जिन्होंने प्रशासन, अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था में स्थायी सुधार किए। इन्हीं महान शासकों में से एक थे शेरशाह सूरी, जिन्होंने भारतीय मुद्रा प्रणाली को एक मजबूत और संगठित रूप दिया। शेरशाह सूरी ही वह भारतीय शासक थे जिन्होंने चाँदी का शुद्ध सिक्का जारी किया और उसे “रूपया” या “रूपेका” नाम दिया। यही सिक्का आगे चलकर आधुनिक भारतीय रुपये की नींव बना।

शेरशाह सूरी का परिचय

शेरशाह सूरी का मूल नाम फ़रीद ख़ान था। उन्होंने 1540 ई. में मुगल शासक हुमायूँ को पराजित कर सूरी वंश की स्थापना की। उनका शासनकाल भले ही केवल पाँच वर्षों (1540–1545 ई.) का रहा, लेकिन इस छोटे से समय में उन्होंने प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिसका प्रभाव आने वाली सदियों तक देखने को मिला।

चाँदी के “रूपया” सिक्के की शुरुआत

शेरशाह सूरी से पहले भारत में सिक्कों की कोई एकरूप प्रणाली नहीं थी। अलग–अलग क्षेत्रों में अलग–अलग प्रकार के सिक्के चलन में थे, जिनकी शुद्धता और वजन में अंतर होता था। इससे व्यापार और कर व्यवस्था में काफी कठिनाइयाँ आती थीं।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए शेरशाह सूरी ने चाँदी का मानकीकृत सिक्का जारी किया, जिसका वजन लगभग 178 ग्रेन (लगभग 11.5 ग्राम) था। इस सिक्के को उन्होंने “रूपया” या “रूपेका” नाम दिया। यह सिक्का शुद्ध चाँदी से बना होता था और पूरे साम्राज्य में एक समान मूल्य पर स्वीकार किया जाता था।

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मुद्रा व्यवस्था में अन्य सुधार

शेरशाह सूरी ने केवल चाँदी का रुपया ही नहीं, बल्कि एक पूर्ण मुद्रा प्रणाली विकसित की।

  • ताँबे का सिक्का “दाम”
  • सोने का सिक्का “मोहुर”

इन सिक्कों के बीच निश्चित अनुपात तय किया गया, जिससे लेन–देन आसान और पारदर्शी हो गया। यह व्यवस्था इतनी प्रभावी थी कि बाद में मुगल शासकों, विशेष रूप से अकबर ने भी इसी प्रणाली को अपनाया।

व्यापार और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

रूपया सिक्के की शुरुआत से व्यापारियों को बहुत लाभ हुआ। अब उन्हें अलग–अलग सिक्कों को परखने की आवश्यकता नहीं रही। एक मानक मुद्रा होने से:

  • आंतरिक और विदेशी व्यापार को बढ़ावा मिला
  • कर संग्रह सरल हुआ
  • किसानों और व्यापारियों में भरोसा बढ़ा
  • राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई

यह कहा जा सकता है कि शेरशाह सूरी ने भारत में आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी।

ऐतिहासिक महत्व

शेरशाह सूरी द्वारा जारी किया गया “रूपया” केवल एक सिक्का नहीं था, बल्कि यह एक आर्थिक क्रांति का प्रतीक था। यही “रूपया” समय के साथ बदलते हुए आज भारत की राष्ट्रीय मुद्रा बना। इतना ही नहीं, “रुपया” शब्द का प्रभाव कई एशियाई देशों की मुद्राओं पर भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष

16वीं शताब्दी में शेरशाह सूरी वह भारतीय शासक थे जिन्होंने चाँदी का शुद्ध सिक्का जारी कर उसे रूपेका (रुपया) नाम दिया। उनकी दूरदर्शी सोच और प्रशासनिक कुशलता ने भारतीय मुद्रा व्यवस्था को स्थायित्व और विश्वसनीयता प्रदान की। इतिहास में शेरशाह सूरी को न केवल एक महान शासक, बल्कि भारतीय आर्थिक व्यवस्था का सच्चा सुधारक माना जाता है।

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